It's my complicated blog like my complicated life.
चंद्र ग्रहण
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ग्रहण तो तुम लगा गई…
कुछ जिंदगी में
कुछ सासों में
कुछ बातों में
कुछ यादों में
सारी की सारी रातों में
आज रात का ये 'चन्द्र ग्रहण' कुछ नही है तेरी ग्रहण के सामने…
तुम शाम करो ना जिंदगी में मैं चला जा रहा हूँ उठ कर चौखट से रोक लो मुझे अपने मीठी बातों से, ना रुका तो मेरा हाथ थाम लेना अपने इन्ही कोमल - कोमल हाथों से… रख लो अपने सीने में सुन लूँगा तुम्हारी धड़कनों को सुनाऊँगा इन्ही से कोई कविता न जाऊँगा कभी दूर तुम्हारे सीने से… तुम शाम करो ना जिंदगी में नदिया के उसपार है मेरा गाँव कह दो, गर तुम साथ चलोगी तो पार करेंगे हम, नदीया नौका से॥ दूर जाने से नही मिलेगी मेरे मन को आनंद दूर जाने से नही मिलेगी कजरे की सुगंध, दूर होने से दोनों को ही नही आएगी निद्रा रोक लो मुझे, चाय पीने के बहाने से… न रुका तो जरा सा आवाज़ कर लेना अपने पायलों की झंकारे से… देखो तुम अंदर अकेली न जाओ अपने साथ मेरी आत्मा ले जाओ, मैं खुद को बड़े अच्छे से लूँगा संभाल यादों में बनी तुम्हारे चित्र के सहारे से… सघन मन में गहन वेदनाएं रह जाएंगी सघन वरण में गहन अश्रुएं रह जाएंगी ये और भी गहन होते चले जायेंगे मैं यथा बढ़ता जाऊंगा तुम्हारे द्वारे से… तुम शाम करो ना जिंदगी में गाँव का पथ ये लंबा बहुत है, ये स्वतः ही छोटा हो जाएगा मेरे संग, तुम्हारे उस ओ...
सब मिल ही जाता तो मैं लिखता क्या? जो तू मिल जाती तो ये बेवफाई मैं लिखता क्या? जो मुझे तेरी जरा सी मुस्कान मिल जाती तो मैं लिखता क्या? जो तुम्हारी नज़रें मुझसे मिल जाती तो मैं ये दर्द-ए-जुदाई लिखता क्या? मुझे मीठी वाणी मिल जाती तो मैं लिखता क्या? जो तू मुझे शर्माती हुई मिल जाती तो मैं ये रूसवाई लिखता क्या? जो तुम्हारा एक इशारा मिल जाता तो मैं लिखता क्या? अरे कम से कम, तुम्हारी नफ़रत ही मिल जाती तो मैं बेवजह की ये पंक्तियां, लिखता क्या? :- रूपम पति
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