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साक़ी ने पीला दिया

यूँ तो ना थी जन्म से मयख़ाने जाने की आदत किसी रोज मयख़ाने ने तन्हा देख कर बुला लिया, साक़ी से बात करवाने के बहाने हमें पीला दिया हमें उस दिन लगाव हो गया शराब से जिस दिन साक़ी ने अपने हाथों से पीला दिया…

चल देखता हूँ (व'सिष-रूपम)

रूपम चल देखता हूँ, किसका नशा जल्दी उतरता है…? ये शराब का या तेरी यादों का… व'सिष यादों का पैमाना हमेशा से भरा हुआ है ये ख़त्म होने की चीज़ नहीं । मैखाना दस बजे बंद हो जाएगी इसे रात भर खुली रहने की इजाज़त नहीं । रूपम ये सरकारें पीने नही देती हैं, और समाज प्यार करने नही देता…

शौक तो हमें

शौक तो हमें भी शराब की नही थी, मगर उनकी बेवफाई ने बेबस करा दिया.. ज़ाहिल नही हैं आप जो चंद रुपयों में बिकेंगे पढ़ लिख रहे कालिज में, अब दोनों लाइब्रेरी में मिलेंगे, जिस दिन तुमने देखी  लाइब्रेरी में भी बन्दूकें उस दिन भगवान के तख्त पे भी इंसान मिलेंगे, बच्चों के हाथ में  पब्जि जैसे और गेम आए तो तुम्हें ये खेल के मैदान भी सुनसान मिलेंगे, लोग केहते हैं, मेहनत करने वालों की हार नही होती! मेहनत करते रहो, वो नही तो उसके दोस्त मिलेंगे…