मैंने तुम्हें चाहा है…

A poem by Swarup kumar and Rupam pati

मैंने देखा था तुम्हारे नयनों को, न पूरे होने वाले सपनो में,
कह रही थी छोड़कर आओ, अपनो को मेरे उस सपने में।

तुम न पूरी होने वाली ख्वाहिश हो फिर भी तेरा ही दीवाना हूँ,
तुम जलती हुई लौ हो और उसमें जलने वाला मैं तेरा परवाना हूँ।

मैंने तुम्हें चाहा है, सोचा है और अपनी इन कविताओं में पिरोया है……

काश होता तेरे अल्फाजों में, तेरे ग़ज़लों के किसी मझधार में
तुम गाती मेरे नाम की गीत अपने पूरे दिनचर्या में,
सुनाने ग़ज़ल तुम आती खुद को बचाते हुए जमाने से।

कमाल की अपनी मोहब्बत होती इस नफरत की दुनिया मे,
पर सपने ऐसे ही थोड़ी पूरे होते हैं सिर्फ आँखो के बन्द कर लेने से।

मैंने तुम्हें चाहा है, सोचा है और अपनी इन कविताओं में पिरोया है……

:- स्वरूपम
(Swarup kumar , Rupam pati)

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