तुम शाम करो ना जिंदगी में मैं चला जा रहा हूँ उठ कर चौखट से रोक लो मुझे अपने मीठी बातों से, ना रुका तो मेरा हाथ थाम लेना अपने इन्ही कोमल - कोमल हाथों से… रख लो अपने सीने में सुन लूँगा तुम्हारी धड़कनों को सुनाऊँगा इन्ही से कोई कविता न जाऊँगा कभी दूर तुम्हारे सीने से… तुम शाम करो ना जिंदगी में नदिया के उसपार है मेरा गाँव कह दो, गर तुम साथ चलोगी तो पार करेंगे हम, नदीया नौका से॥ दूर जाने से नही मिलेगी मेरे मन को आनंद दूर जाने से नही मिलेगी कजरे की सुगंध, दूर होने से दोनों को ही नही आएगी निद्रा रोक लो मुझे, चाय पीने के बहाने से… न रुका तो जरा सा आवाज़ कर लेना अपने पायलों की झंकारे से… देखो तुम अंदर अकेली न जाओ अपने साथ मेरी आत्मा ले जाओ, मैं खुद को बड़े अच्छे से लूँगा संभाल यादों में बनी तुम्हारे चित्र के सहारे से… सघन मन में गहन वेदनाएं रह जाएंगी सघन वरण में गहन अश्रुएं रह जाएंगी ये और भी गहन होते चले जायेंगे मैं यथा बढ़ता जाऊंगा तुम्हारे द्वारे से… तुम शाम करो ना जिंदगी में गाँव का पथ ये लंबा बहुत है, ये स्वतः ही छोटा हो जाएगा मेरे संग, तुम्हारे उस ओ...
झारखंड की पहली विधानसभा का गठन 22 नवंबर 2000 हुई थी याने राज्य बनने के एक हफ्ते के बाद। शुरुआत से ही झारखंड त्रिशंकु रहा है, कोदाईबांक एक छोटा सा गाँव का बाबूलाल मारंडी नामक व्यक्ति राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बनाए जाते हैं, उनके द्वारा लिए गए प्रमुख निर्णयों में 1932 खतियान को स्थानीयता का आधार बनाया गया और थर्ड ग्रैड के सरकारी पोस्ट्स को स्थानीयों के लिए आरक्षित रखा गया। झारखंड के लोगों ने सोच रखा था की अब हमारी राज्य की विकास होगी-यहाँ के लोगों की विकास होगी किन्तु उन्हे कहाँ पता था की उनकी ये आशा इतनी जल्दी टूटने वाली है। 2 वर्षों तक सब कुछ सही चलता है, उसके बाद जदयू (हाँ वही नीतीश कुमार जी की पार्टी) के दवाब के कारण बाबूलाल जी को अपनी सत्ता अपने ही दल के विधायक अर्जुन मुंडा जी को सौंपनी पड़ी। अर्जुन मुंडा जो की JMM (झारखंड मुक्ति मोर्चा) से 1995 में कोल्हान की खरसावाँ विधानसभा से विधायक बने थे और 2000 में उन्हें भाजपा से चुनाव लड़ विधानसभा में पहुंचते हैं। बाबूलाल जी द्वारा पारित 1932 खतियान को हाईकोर्ट ने गलत कहते हुए निरस्त करने के आदेश दे दिए, 1932 को लेकर झारखंड में लोग सड़कों पर ...
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